Publications & Resources
Our faculty, students and researchers work together everyday to contribute to a better world by grappling with urgent problems we are facing in India. We conduct rigorous work to produce high quality learning resources and publications to contribute to public discourse and social change. Here, we feature a sample from our work for everyone to access. You can explore featured resources, policies, and the latest publications from the University.
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पाठशाला भीतर और बाहर का जून अंक विद्यालय संस्कृति, डर किस तरह सीखना बाधित करता है और साथ मिलकर सीखना कैसे सीखने के आनंद को बढ़ा देता है जैसे मुद्दों पर केन्द्रित है। इसके अलावा बाल साहित्य या पढ़ने की घण्टी को भाषा की गतिविधि तक सीमित न रखकर उसका जुड़ाव तमाम विषयों को समझने और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में कैसे देखा जा सकता है, पहली और दूसरी भाषा सीखने से जुड़ी मुश्किलों और उनसे निकलने के लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई गई इस बारे में भी लेख इस अंक में शामिल है। इसके अतिरिक्त हमेशा की तरह सभी स्थाई स्तम्भ भी अंक का हिस्सा हैं, जिनमें विभिन्न राज्यों से आई शिक्षक डायरी, ‘किताबों से दोस्ती’ में कुछ ज़रूरी किताबों की बात, ‘उम्मीद जगाते शिक्षक’ के अन्तर्गत पढ़ेंगे ऐसे शिक्षक की कहानी जिन्होंने पढ़ने-लिखने की गतिविधियों को कुछ इस तरह विद्यालय में किया कि विद्यार्थियों का पढ़ना-लिखना बेहतर हुआ। साथ ही हैं कुछ रोचक और उपयोगी गतिविधियाँ।
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पाठशाला भीतर और बाहर का मार्च अंक शिक्षण के लिए उपयोगी अनुभवजन्य सामग्री को समेटे है। इस अंक में आप पढ़ेंगे कि विद्यार्थी उच्च कक्षाओं में तो पहुँच जाते हैं, लेकिन बहुत सारे विद्यार्थियों की दक्षता का स्तर पिछली कक्षाओं के अनुरूप नहीं बन पाता है। ऐसे में शिक्षकों के सम्मुख जो चुनौती होती है, उसका समाधान कैसे करें? शिक्षण योजना बनाकर शिक्षण करने के अनुभव और इससे बच्चों के सीखने में आए अन्तर को समझना हो या इबारती सवालों की इबारत में उलझे बच्चों की उलझन को सुलझाना, या ऐसे ही अन्य विविध विषयों पर बात करते लेख, सब इस अंक का हिस्सा हैं। हमेशा की तरह शिक्षकों की डायरी, इनसे मिलिए सहित, किताबों से दोस्ती और आइए, करके देखें जैसे सभी स्थाई स्तम्भ भी अंक में शामिल हैं।

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पाठशाला भीतर और बाहर का दिसम्बर अंक केन्द्रित है ‘प्रारम्भिक बाल्यावस्था और शिक्षा’ पर। इस अंक में प्रारम्भिक बाल्यावस्था और शिक्षा पर केन्द्रित विविध अनुभव-आधारित आलेख, एक सैद्धान्तिक लेख, शिक्षकों की डायरी में दर्ज उनके अनुभव उन्हीं की कलम से, कुछ रोचक तथा आसानी से की जा सकने वाली गतिविधियाँ और ऐसी किताबें, जिनका उपयोग प्रारम्भिक बाल्यावस्था के लिए किया जा सके, शामिल हैं। साथ ही ‘उम्मीद जगाते शिक्षक’ के अन्तर्गत एक आँगनवाड़ी कार्यकर्त्री, जिन्होंने अपने केन्द्र को बदलाव के नए स्तर दिए, की यात्रा के अनुभव, उनकी कहानी भी है।

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पाठशाला भीतर और बाहर का यह विशेष अंक है। इस अंक के साथ पाठशाला पत्रिका ने 25 अंकों का सफ़र तय किया है। इस विशेष 25वें अंक में शामिल हैं 13 राज्यों से आई 25 शिक्षकों की डायरियाँ जिनमें दर्ज हैं उनके कक्षा अनुभव। साथ ही, 5 आलेख ‘बन्धुता की शिक्षा’, ‘शिक्षकों के विकास में सहयोग ही उनका सम्मान है’, ‘शिक्षा और शिक्षक : ज़मीनी चुनौतियों को समझने की जरूरत’, ‘विद्यार्थियों के जीवन को आकार देते हैं शिक्षक’, ‘पाठशाला भीतर और बाहर के 25 अंकों का सफ़र’ शामिल हैं। ये आलेख शिक्षकों के काम को भरोसे के तौर पर देखते हैं, और आने वाले समय में शिक्षा में सकारात्मक बदलाव के प्रति आश्वस्ति जगाते हैं।

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पाठशाला भीतर और बाहर के जून अंक (24वाँ) में एफ़एलएन की अवधारणा, कक्षा अनुभव, चुनौतियाँ, आदि को केन्द्र में रखकर लिखे गए कुछ लेख हैं। बातचीत के ज़रिए विद्यार्थियों से जुड़ना और उस बातचीत का शिक्षण प्रक्रिया में उपयोग कैसे हो, बच्चों को रचनात्मक लेखन से कैसे जोड़ें, पाठ योजना बनाकर पढ़ाना कैसे उपयोगी होता है, जैसे लेख भी शामिल हैं। एक ऐसे विद्यालय की कहानी को पढ़ना दिलचस्प होगा जिसका नामांकन एकदम कम हो गया था, लेकिन कुछ ख़ास प्रक्रियाएँ अपनाने से उस विद्यालय में न सिर्फ़ नामांकन बढ़ा, बल्कि विद्यार्थियों के सीखने का स्तर भी बेहतर हुआ।
हमेशा की तरह ईसीसीई पर आलेख है जिसमें आँगनवाड़ी केन्द्र के माहौल और गतिविधियों से जुड़े अनुभव शामिल हैं। नियमित स्तम्भ के अन्तर्गत इस बार ‘इनसे मिलिए’ में मध्य प्रदेश की शिक्षिका से जानेंगे उनके अनुभव, कि कैसे और कौन‑सी प्रक्रियाओं के चलते सीखना बेहतर हुआ। इसके अलावा, इस अंक में ‘शिक्षकों की डायरी से’, ‘किताबों से दोस्ती’, और ‘आइए, करके देखें’ स्तम्भ भी शामिल हैं।

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पाठशाला भीतर और बाहर का 23वाँ अंक मार्च, अप्रैल और मई के दौरान स्कूल की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर सँजोने का प्रयास किया है। इस अंक में आप पढ़ेंगे कुछ लेख जिनसे आकलन को कैसे देखा जाए, इसकी स्पष्टता मिलेगी। आकलन का उपयोग किस तरह शिक्षण प्रक्रियाओं में किया जाए,समर कैम्प किस तरह आनन्ददायक तरीक़े से बच्चों के सीखने के रूप में आयोजित हों,बच्चे जो वार्षिक परीक्षाओं के दौरान तय किए गए सीखने के प्रतिफलों से थोड़ा दूर रह गए हैं किस तरह उनके साथ अप्रैल और मई के महीनों में काम हो, क्या योजना हो, आदि के बारे में कुछ अनुभवजन्य आलेख इस अंक में शामिल हैं। इसके अलावा गणित, हिन्दी, विज्ञान, ईसीई पर भी अनुभव-आधारित लेख इस अंक में हैं। साथ ही हैं सभी स्थाई स्तम्भ।

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पाठशाला भीतर और बाहर का 22वाँ अंक ‘समावेशी शिक्षा विशेषांक’ है। समावेशन शब्द एकबारगी विशेष दक्षता वाले बच्चों के बारे में ध्वनित होता मालूम होता है। लेकिन इसकी परतों को खोलने पर समझ में आता है कि इसमें विशेष दक्षता वाले बच्चों की बात तो निश्चित तौर पर है ही, साथ ही बात है अलग-अलग सामाजिक‑आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश के विविध मनोभावों वाले वंचित समुदाय के बच्चों की शिक्षा और संसाधनों के बारे में भी। संवैधानिक मूल्यों में रचे बसे स्नेह और सम्मान जैसे मानवीय मूल्य हर बच्चे के लिए ज़रूरी हैं।
इस अंक में आप पढ़ेंगे कि शिक्षक शिक्षा में समावेशन को लेकर किस तरह की योजनाएँ हैं; किस तरह एक विशेष विद्यालय को समावेशी विद्यालय बनाया जा सका; और कलाओं, खेलों, संगीत, आदि के ज़रिए किस तरह समावेशन को दस्तावेज़ों से निकालकर हक़ीक़त में उतारा गया।
आप इस अंक में कुछ स्थाई स्तम्भ भी पढ़ेंगे जिनमें ‘उम्मीद जगाते शिक्षक’ की कहानी है, ‘किताबों से दोस्ती’ में जानेंगे 3 सुन्दर किताबों के बारे में, और ‘आइए, करके देखें’ में समावेशन पर आधारित ऐसी गतिविधियाँ जिन्हें आसानी से कराया जा सकता है। इनके साथ ‘शिक्षकों की डायरी’ स्तम्भ में आप पढ़ेंगे शिक्षकों के काम, उनकी बातें, उनके अनुभव।

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हमारे समाज में स्त्री-पुरुष, लड़के-लड़कियों के बीच ग़ैर‑बराबरी की सामाजिक‑सांस्कृतिक जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं। इनपर कक्षा में बात करना बहुत ज़रूरी है। पाठशाला के इक्कीसवें अंक के एक लेख में इस विषय पर बच्चों से की गई चर्चा के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। एक अन्य लेख इस बात की पैरवी करता है कि बच्चे डर के माहौल से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से बेहतर सीखते हैं। इसके लिए शिक्षकों में बच्चों के प्रति सहानुभूति व समानुभूति का बोध होना चाहिए। सुबह की सभा, यानी मॉर्निंग असेंबली का शिक्षकों और बच्चों के लिए क्या महत्त्व है; और इसे ज़्यादा रचनात्मक, शैक्षिक और भागीदारीपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है? एक लेख में इस बारे में चर्चा की गई है। इबारती सवालों पर काम के अनुभव पर आधारित एक लेख में बताया गया है कि जब तक गणित में भाषा का ज़्यादा-से-ज़्यादा इस्तेमाल न किया जाए, बच्चों को गणित समझने में दिक़्क़त आती है। गणित के दूसरे लेख में मापन की अवधारणा, उसकी इकाइयों एवं पैमाने से लम्बाई मापने के अनुभव साझा किए गए हैं।
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हमारे आज के विविधतापूर्ण और बहुरंगी समाज के लिए हिंसा और शोषण की संस्कृति ठीक नहीं है। आज के दौर के लिए संवाद की संस्कृति ही ज़्यादा ठीक है। इस विचार पर पाठशाला भीतर और बाहर के बीसवें अंक के एक लेख का मुख्य विषय के रूप में विस्तार से बात की गई है। इस अंक के कुछ लेखों में पाठ्यपुस्तक और पाठ्येतर कहानी-कविताओं के शिक्षण की सुविचारित योजना बनाकर भाषाई कौशलों के विकास और इनके आकलन पर किए गए कार्य के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। जिसमें एक लेख डायरी लेखन और दूसरा लेख रीडिंग कॉर्नर के ज़रिए बच्चों को लेखन सिखाने के तरीकों के बारे में है। गणित का एक लेख बच्चों को शुरुआत से ही इबारती सवालों पर काम करने, खुद सवाल बनाने और जाँचने को गणितीयकरण की प्रक्रिया के तौर पर देखता है। दूसरा गणितीय सोच व तार्किक क्षमता के विकास के लिए तरीके सुझाता है। इस बार के संवाद का विषय विज्ञान, वैज्ञानिक सोच और पाठ्यपुस्तकें है।
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पाठशाला भीतर और बाहर के उन्नीसवें अंक के ज़्यादातर लेख पुस्तकालय और भाषा की पढ़ाई के विविध पहलुओं पर केन्द्रित हैं। इन लेखों में, अच्छी किताबों से ही अच्छे स्कूल पुस्तकालय की कल्पना साकार होती है व पुस्तकालय को जीवन्त और सक्रिय कैसे बनाया जाए, जैसे विषयों को उठाया गया है। एक लेख लोकतंत्र में संवाद की संस्कृति बनाने व इसके महत्त्व के बारे में है। साक्षात्कार में चिन्तनशील शिक्षक और इनकी रचनात्मकता के विकास की प्रक्रिया पर चर्चा की गई है। संवाद में, संवैधानिक मूल्य बन्धुता के भाव को विकसित करने के लिए स्कूली स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों के बारे में अनुभवपरक विचार रखे गए हैं।
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पाठशाला भीतर और बाहर का अठारहवाँ अंक पुस्तकालय पर केन्द्रित है। एक जीवन्त पुस्तकालय के बिना स्कूल की कल्पना अधूरी है। जीवन्त पुस्तकालय की कल्पना को साकार करने के लिए किए जा रहे कई अलग-अलग अनुभव इस अंक में शामिल हैं। इस अंक में शामिल ‘संवाद’ पुस्तकालय और पढ़ने की संस्कृति पर केन्द्रित है। क्या पुस्तकालय एक शान्त जगह हो या यहाँ बच्चों को बात करने की छूट हो, स्कूली विषय व इतर पुस्तकें, आदि विषय भी इस अंक में शामिल हैं। कुछ लेख पढ़ने और लिखने के सन्दर्भ में नए अनुभवों व दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करते हैं। एक लेख सामाजिक विज्ञान की विषयवस्तु और पढ़ाई से विद्यार्थियों में आलोचनात्मक जागरूकता पैदा करने के तौर‑तरीक़ों के बारे में है।
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गणना करना सीखना और संक्रियाएँ सीखना ही गणित सीखना नहीं है। गणित सीखने में बहुत कुछ है। इसके लिए गणित की भाषा सीखना और स्वयं गणित करना अहम है। ऐसा गणित, जो आपके दिमाग की क्षमता को खींचे व कर पाने की खुशी भी दे । इस अंक में गणित के लेख इन बातों को बखूबी दिखा रहे हैं। बच्चों को लिखना सिखाने पर भी इस अंक के लेखों में विस्तृत बात हुई है। संवाद व अन्य लेख लिखने के आयामों यथा लिखना और पुस्तकें पढ़ना-लिखना और मौखिक अभिव्यक्ति आदि को उभारते हैं। सीखने में अर्थ की भूमिका अहम है। जो भी सीखा जाना है, सीखने वाला अपने लिए उसका अर्थ खुद गढ़ता है और जब वह यह अर्थ गढ़ पाता है, तभी सीख पाता है। बच्चों को कविता का अर्थ खुद गढ़ने देने की बात करता एक लेख, कविता ही नहीं बल्कि कुछ भी सीखने में अर्थ की भूमिका क्या हो सकती है, रेखांकित करता है। शामिल पुस्तक चर्चा भी बच्चों के सीखने के बारे में बहुत से महत्त्वपूर्ण बिन्दु रखती है।
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पाठशाला भीतर और बाहर के सोलहवें अंक में शिक्षा के कुछ बुनियादी मसलों यथा शिक्षा में समावेशन, शुरुआती भाषा शिक्षण के पहलुओं, सामाजिक विज्ञान शिक्षण व नैतिक समझ के विकास आदि पर कक्षा के अनुभवों से उभरे व उन अनुभवों के विश्लेषण को समेटे हुए लेख हैं। चूँकि यह लेख कक्षा से अनुभवों से उभरे हैं, अतः यह उनके यथार्थ, संभावनाओं व चुनौतियों को सामने रखते हैं।
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पाठशाला का पन्द्रहवाँ अंक दो विषय क्षेत्रों- सामाजिक विज्ञान व इसका शिक्षण और स्कूल में भाषा सीखने की प्रक्रियाओं पर केन्द्रित है। अंक में कुछ लेख इस बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए हैं कि सामाजिक संरचना हमें और हमारे काम को कैसे प्रभावित करती है। कक्षा अनुभवों पर आधारित लेख हमें यह समझने में मदद करते हैं कि बच्चे जटिल सामाजिक विचारों से कैसे जुड़ सकते हैं। बच्चों के साथ गहन अनुभवों पर आधारित लेख प्रारम्भिक भाषा शिक्षण और पढ़ना सीखने-सिखाने में मदद करते हैं।
This Fifteenth issue Pathshala is focused on two areas; Social Sciences and its teaching and processes towards learning language in schools. Some articles included are to build awareness of how social structure affects us and our work. The articles focus on classroom experiences and help us understand how children can engage with complex social ideas. The articles based on rigorous experience of children also help them engage with early language teaching and reading.
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