दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण की दिशा में एक द्विआयामी रणनीति : आरुषि से प्राप्त सबक

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परिचय

एक सामान्य, गैर‑दिव्यांग व्यक्ति को यदि सार्वजनिक सड़क पर दो सौ मीटर की दूरी चलकर तय करनी है, तो उसे गड्ढों, गैर‑मौजूद फुटपाथों, और यदि वे मौजूद हैं, तो वे मलबे, पशुओं के मल से ढँके होने के साथ, भ्रामक रूप से खतरनाक तरीके से खुदे हुए हो सकते हैं, बिजली के लटके हुए तारों और बहुत बार, लापरवाहीपूर्वक चलाए जा रहे दोपहिया वाहनों जैसी मुश्किलों से निबटना ही पड़ता है। व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वाला एक व्यक्ति; कोई ऐसा व्यक्ति जो देख नहीं सकता; जो सुन नहीं सकता; कोई ऐसा व्यक्ति जिसके पैर थोड़े धीमे चलते हैं या जो नई परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया कर रहा है, उससे हमारे सार्वजनिक स्थलों पर कभी भी सामने आ जाने वाली ऐसी खतरनाक उलझनों से निबटने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? क्या ऐसे व्यक्तियों द्वारा बाहर निकलने से मना करना या उनकी देखभाल करने वालों द्वारा उन्हें बाहर निकलने से रोकना गलत है? क्या अपने घरों और शायद कुछ अन्य जगहों की सुरक्षित हदों को नहीं छोड़ने का कहना गलत है? परिवहन, सेवाओं, बुनियादी ढाँचे, सार्वजनिक स्थलों – स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों, बाज़ारों, बैंकों, सिनेमाघरों, उद्यानों – सभी की रूपरेखा गैर‑दिव्यांग आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तैयार की गई हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, देश में एकल या बहु-दिव्यांगता वाले 2.68 करोड़ व्यक्ति हैं (स्वतंत्र संगठनों और दिव्यांगजनों (PWDs) के साथ काम करने वाले लोगों द्वारा इस संख्या को मानने से इन्कार किया जाता है; यहाँ तक​कि विश्व बैंक भी यह आँकड़ा 4 – 8 करोड़ के बीच मानता है।) ऐसा नहीं है कि राज्य ने उनके अस्तित्व को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया है। इस समूह के हितों की रक्षा के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (RPWD Act of 2016) सहित, केन्द्र और राज्य सरकारों दोनों द्वारा कई अधिकार और रियायतें प्रदान की गई हैं। शासन के स्तर पर सूचना के उचित प्रसार का अभाव है और इन तक इस सीमान्त समूह की पहुँच के लिए आवश्यक जागरूकता और साधनों की कमी भी है। लेकिन भौतिक पहुँच के अलावा, दिव्यांगताओं और दिव्यांगजनों के सम्बन्ध में बहुसंख्यक आबादी के रवैया और मानसिकता से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ बाकी लोगों के साथ दिव्यांगजनों के निर्बाध रूप से समावेशन के मार्ग में मौजूद सतत बाधाएँ हैं।

आरुषि भोपाल स्थित एक गैर‑लाभकारी संस्था है जो दिव्यांगजनों (PWDs) के साथ और उनके लिए काम करती है। इसकी स्थापना 1992 में सामाजिक रूप से जागरूक और सामाजिक रूप से इच्छुक युवकों के एक समूह द्वारा की गई थी, जिनमें से दो आज इस संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं – अनिल मुद्गल और रोहित त्रिवेदी। उन्होंने सरकार द्वारा संचालित ब्लाइंड रिलीफ़ एसोसिएशन में रहने वाले नेत्रहीन छात्रों के साथ अपना काम शुरू किया। उन्होंने एक समूह बनाकर शुरुआत की जो नेत्रहीन छात्रों को पाठ पढ़कर सुनाता था। उन्होंने कैसेट टेप्स पर पाठ रिकॉर्ड करने की दिशा में कदम बढ़ाया; परीक्षा के दौरान वे नेत्रहीन छात्रों के साथ लेखकों (scribes) के रूप में जाने लगे और उनमें और अधिक करने की प्रेरणा उत्पन्न हुई क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि समाज से दिव्यांगजन (PWDs) पूर्ण रूप से बहिष्कृत हैं।

गतिविधियों का विहंगावलोकन

कुल मिलाकर, आरुषि का काम समावेशन पर केन्द्रित है — दिव्यांगजनों (PWDs) को हर जगह जाने और वह सब कुछ करने में सक्षम होना चाहिए जो बाकी सब करते हैं। उनका दृष्टिकोण द्विआयामी है। एक ओर, वे दिव्यांगजनों (PWDs) को सशक्त बनाते हैं और दूसरी ओर, वे गैर‑दिव्यांग लोगों को दिव्यांगजनों (PWDs) की आवश्यकताओं, माँगों/अपेक्षाओं और क्षमताओं के बारे में संवेदनशील बनाते हैं।

दिव्यांगजनों (PWDs) का सशक्तिकरण

आजीविका में उनकी मदद करने से लेकर उनकी देखभाल और उनके जीवन में उत्साह लाने और उत्तम दर्जे की चिकित्सा और सेवाएँ प्रदान करने तक, आरुषि उन दिव्यांगजनों (PWDs) के जीवन के हर पहलू का ख्याल रखती है, जिनके साथ वह काम करती है। वह माता-पिता और परिवारों को परामर्श और सहायता प्रदान करती है जिससे दिव्यांग बच्चों के विकास और जीवन में उनके द्वारा बेहतर प्रदर्शन करने के लिए सामर्थ्यकारी परिस्थितियाँ निर्मित करने में उल्लेखनीय सहायता मिलती है।

1. यात्राएँ और अनुकरणीय व्यक्तियों से मुलाकात

दिव्यांग बच्चों को बाहर सार्वजनिक स्थानों पर ले जाया जाता है – मॉल, कैफ़े, चिड़ियाघर, गोकार्टिंग (gocarting), सांस्कृतिक कार्यक्रम, मनोरंजन उद्यानों और अन्य शहरों की यात्रा पर ले जाया जाता है जहाँ वे समुद्र तटों, पहाड़ों, स्मारकों और संग्रहालयों का भ्रमण करते हैं। यहाँ तक​कि खराब बुनियादी ढाँचे, दुर्गम परिवहन और सार्वजनिक स्थलों, दिव्यांगों के अनुकूल शौचालयों के अभाव से निपटने के लिए भारी संघर्ष को देखते हुए, उनके परिवार भी छुट्टियों में उन्हें अपने साथ ले जाने में हिचकिचाते हैं। साथ ही, उनका मानना​है कि इस तरह की कोशिश दिव्यांग बच्चे के लिए किसी काम की नहीं’ है।

इन यात्राओं पर बच्चों को कला, सिनेमा और खेल के क्षेत्र के उनके आदर्शों से मुलाकात के लिए ले जाया जाता है। इन यात्राओं ने बच्चों को अत्यधिक अनुभव और आत्मविश्वास प्रदान किया है, जो केन्द्र में आने वाले लोगों से मिलने पर उनकी जिज्ञासा और हाव‑भाव से स्पष्ट होता है। इन यात्राओं का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि इनकी व्यवस्था उन शहरों के लोगों द्वारा स्वेच्छापूर्वक की जाती है जहाँ वे जाते हैं। वे स्वेच्छापूर्वक उनके रहने के लिए स्थान, परिवहन के लिए वाहन या भोजन उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न ज़िम्मेदारियाँ स्वीकार करते हैं।

2. स्कूल के लिए तैयारी कार्यक्रम

उनके प्री-स्कूल कोशिश’ में पाँच वर्ष से कम उम्र के ऐसे दिव्यांग बच्चों को जो स्कूल में नामांकित नहीं हैंकी तैयारी के लिए बुनियादी कौशल सिखाए जाते हैं ताकि उन्हें जल्द से जल्द नियमित स्कूलों में प्रवेश दिलाया जा सके। यह स्कूल दिव्यांग बच्चों को भौतिक चिकित्सा, प्रारम्भिक भाषा प्रशिक्षण/ऑडियो मौखिक चिकित्सा, ब्रेल, अभिविन्यास और गतिशीलता प्रशिक्षण और सभी प्रकार की आवश्यक शारीरिक और अधिगम सहायता प्रदान करता है। खेल के माध्यम से शिक्षा (play-way) पद्धति का उपयोग करते हुए, विशेष शिक्षक बच्चों को श्रवण, दृश्य और स्पर्श सम्बन्धी प्रेरणा (stimuli) से परिचित कराते हैं। सीखने के लिए बच्चे की तत्परता और उसकी भावनात्मक और शारीरिक क्षमताओं जैसे कारकों से शिक्षकों को मार्गदर्शन प्राप्त होता है। स्कूल द्वारा माता-पिता को परामर्श प्रदान किया जाता है, आवश्यकतानुसार विशेष फर्नीचर की व्यवस्था की जाती है और निरन्तर अधिगम सहायता के साथ नियमित स्कूलों में प्रवेश में मदद की जाती है।

3. कंप्यूटर प्रशिक्षण

आरुषि में सभी बच्चों को बुनियादी कंप्यूटर साक्षरता प्रदान की जाती है। आवश्यकता आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। आरुषि अन्य राज्यों के दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए भी कंप्यूटर प्रशिक्षण आयोजित करती है। केन्द्र में एक दर्जन से अधिक कंप्यूटरों से भलीभाँति सुसज्जित एक कंप्यूटर कक्ष है, जिसमें सभी कंप्यूटर नेत्रबाधितों और बधिरों के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर से लैस हैं।

4. दिव्यांगता हेल्पलाइन

पेंशन, छात्रवृत्ति, विवाह, ऋण, रोज़गार, स्वरोज़गार जैसे दिव्यांगता सम्बन्धी मुद्दों पर जानकारी प्रदान करने के लिए आरुषि द्वारा सामाजिक न्याय विभाग, मध्य प्रदेश सरकार की सहायता से एक टोल‑फ्री हेल्पलाइन (18002334397) संचालित की जाती है। भारत के सभी भागों से इस हेल्पलाइन पर प्रतिदिन लगभग सौ कॉल आते हैं। जवाब आईवीआरएस के माध्यम से दिए जाते हैं लेकिन कई मामलों में, व्यक्तिगत तौर पर जानकारी और परामर्श प्रदान किया जाता है।

5. बोलने वाली पुस्तकें

किताबों की ऑडियो रिकॉर्डिंग करना उनकी प्रथम पहल थी। यह समूह नेत्रहीन या दृष्टिबाधित छात्रों को पाठ पढ़कर सुनाने के लिए एक साथ आया था। बाद में उन्होंने इस्तेमाल किए गए कैसेट टेप्स पर अध्ययन सामग्री रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया जो इन छात्रों को दे दिए जाते थे। आज, आरुषि के पास एक श्रव्य पुस्तकालय (audio library) है जिसमें स्कूल और कॉलेज के उन छात्रों के लिए 50,000 घण्टे की रिकॉर्डेड पठनीय सामग्री है जो नेत्रहीन, दृष्टि या प्रिण्ट‑बाधित हैं। सीडीज़ (CDs) पर विभिन्न विषयों की पाठ्यपुस्तकें और प्रशिक्षण सम्बन्धी और पूरक सामग्री उपलब्ध हैं।

यह कार्य पूर्णतः स्वैच्छिक है। छात्रों, गृहिणियों, बुजुर्गों और आने वाली मशहूर हस्तियों सहित स्वयंसेवक सभी विषयों के लिए सभी भाषाओं में अध्ययन सामग्री रिकॉर्ड करते हैं और कई राज्यों के छात्र इस सेवा का उपयोग करते हैं। यह सेवा छात्रों के लिए निःशुल्क है और वे किसी भी पुस्तक को रिकॉर्ड करने के लिए भेज सकते हैं।

जबकि बड़ी संख्या में छात्र अब भी इस सेवा का उपयोग करते हैं, हाल के दिनों में, मोबाइल फोन और उपकरणों पर उपलब्ध लिखे हुए को वाणी बदलने वाला (text-to-speech) सॉफ्टवेयर नेत्रहीन छात्रों को ऑनलाइन पुस्तकालयों से ई‑पाठ का उपयोग करने की सुविधा प्रदान करता है, इसलिए अब ऑडियो रिकॉर्डिंग के बजाय ई‑पब प्रारूपों (e‑Pub formats) पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। आरुषि में भी, अब तेज़ी से पुस्तकों को स्कैन और ई‑पाठों में परिवर्तित किया जा रहा है और फिर उन्हें एक डिजिटल पुस्तकालय में रखा जा रहा है जिसका इस्तेमाल दिव्यांगजन (PWDs) कहीं से भी कर सकते हैं।

6. पुस्तकों का ब्रेल प्रतिलेखन

90 के दशक की शुरुआत तक नेत्रहीनता और अल्प दृष्टि वाले कई छात्र पाठ सुनकर पढ़ाई कर रहे थे और परीक्षा उत्तीर्ण कर रहे थे और वे पढ़ना-लिखना नहीं सीख रहे थे। ब्रेल लिपि इन छात्रों को केवल साक्षर ही नहीं, बल्कि शिक्षित होने में सक्षम बनाकर उन्हें सशक्त बनाती है। आरुषि सभी नेत्रहीन बच्चों को ब्रेल लिपि में लिखना सिखाती है। माँगे जाने पर आरुषि द्वारा पुस्तकों का ब्रेल लिपि में प्रतिलेखन भी किया जाता है और उनके पास चुनी हुई ब्रेल पुस्तकों का संग्रह होता है जो वे स्कूल के पुस्तकालयों को देते हैं, जिन्हें स्कूल आपस में घुमाते हैं। आरुषि द्वारा आम जनता के लिए भी ब्रेल कक्षाएँ संचालित की जाती है।

7. सुगम्यता

बाधामुक्त सार्वजनिक स्थलों के लिए आरुषि की वकालत (advocacy) और उनके प्रयासों के कारण 1999 में भारत का पहला दिव्यांग‑अनुकूल बैंक आरम्भ किया गया – सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया की एक शाखा जिसमें व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वालों के लिए रैंप, रेलिंग और कम ऊँचाई वाले काउंटर बनाए गए हैं।

पिछले कुछ सालों में, आरुषि ने अधिक से अधिक सार्वजनिक स्थलों को बाधामुक्त बनाने के लिए निरन्तर प्रयास किए हैं। रैंप, पैदलपथ (फुटपाथ) और चेतावनी टाइल्स (warning tiles), और सूचना पटल और ब्रेल संकेतों की सुविधा के साथ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (IGRMS), क्षेत्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय, राष्ट्रीय उद्यान, राज्य संग्रहालय, भारत भवन, गौहर महल और भोपाल हाट सहित भोपाल के अधिकांश सार्वजनिक स्थल सुगम्य हैं। इसी तरह का कार्य राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली के संग्रहालय और उद्यानों; और मरीन ड्राइव, मुंबई के तीन किलोमीटर के विस्तार में किया गया है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के साथ काम करते हुए, आरुषि ने तीन प्रसिद्ध स्मारकों को पूरी तरह से बाधामुक्त बनाया है – विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप, सांची; टीपू सुल्तान का ग्रीष्मकालीन महल (Summer Palace), बैंगलुरु; और, सातवी शताब्दी का लक्ष्मण मन्दिर, सिरपुर, छत्तीसगढ़। कई अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर, जैसे ताजमहल, आगरा का किला, रेज़ीडेंसी (लखनऊ) से सारनाथ मन्दिर तक – वे ब्रेल लिपि में सूचना पटल लगवाने में सफल रहे हैं। भोपाल रेल मण्डल की मदद से, आरुषि को भोपाल के दो रेलवे स्टेशनों को पूरी तरह से दिव्यांग‑अनुकूल बनाने में सफलता मिली है – मात्र यही दो रेलवे स्टेशन भारत में दिव्यांग‑अनुकूल स्टेशन हैं।

8. आधार

राज्य और केन्द्र सरकार दोनों स्तरों पर सभी सरकारी विभाग दिव्यांग छात्रों को विभिन्न रियायतें प्रदान करते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (भारत सरकार), शिक्षा विभाग और परीक्षा बोर्ड भी समय-समय पर उनकी मदद के लिए दिशा-निर्देश और आदेश जारी करते हैं। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर लाभार्थियों, उनके अभिभावकों, शिक्षकों और स्कूल के अधिकारियों की प्रासंगिक और अद्यतन (updated) जानकारी तक पहुँच नहीं होती है। आरुषि ने मुख्यधारा के स्कूलों में पढ़ रहे दिव्यांग छात्रों को प्राप्त सभी अधिकारों का अनुपालन किया है और इसे आधार’ नामक एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया है। यह पुस्तिका नियमित रूप से अपडेट की जाती है।

जागरूकता और संवेदीकरण

उनका अधिकांश प्रारम्भिक कार्य समुदायों के बीच था, विशेष रूप से झुग्गी बस्तियों में जहाँ गरीबी दिव्यांगजनों (PWDs) को अधिक उपेक्षा की ओर धकेलती है। और वे हमेशा दिव्यांगता-जागरूकता सम्बन्धी जानकारी के प्रसार के लिए नए रास्ते खोज रहे हैं। आरुषि के जागरूकता कार्यक्रम बाधाओं को कम करने और दिव्यांगजनों (PWDs) के बारे में समझ, उनकी स्वीकार्यता और उनके समावेश को बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार और क्रियान्वित किए गए हैं।

1. पोस्टर, पाठ्यपुस्तकों के पृष्ठ, रेल रिज़र्वेशन फॉर्म

दिव्यांगता सम्बन्धी जागरूकता पर आरुषि द्वारा निर्मित लगभग 120 पोस्टर बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान के गैर‑सरकारी संगठनों सहित, सरकारी एजेंसियों और निजी संगठनों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं, जो दिव्यांगता से सम्बन्धित मुद्दों के लिए समर्थन जुटाने और जागरूकता फैलाने के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं। उर्दू, असमिया, गुरुमुखी, बंगाली और तेलुगु सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुवादित पोस्टर देश भर में प्रदर्शित किए गए हैं। इन्हें रेलवे स्टेशनों (उत्तरी रेलवे) और शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों में भी प्रदर्शित किया जाता है। अधिक से अधिक लोगों को समझने में सक्षम बनाने और हर जगह सामर्थ्यकारी स्थितियों का निर्माण करने के लिए रेलवे रिज़र्वेशन फ़ॉर्म पर भी दिव्यांगता सम्बन्धी जागरूकता के विषय में जानकारी छापी जाती है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कक्षा एक से आठ तक की सभी स्कूली पाठ्यपुस्तकों में दिव्यांगता सम्बन्धी जागरूकता और दिव्यांगता के विभिन्न पहलुओं और प्रकारों की जानकारी से सम्बन्धित एक पृष्ठ शामिल किया गया है। इनसे सरल दिशानिर्देश प्राप्त होते हैं जो शिक्षकों, छात्रों, अभिभावकों और अन्य हितधारकों को शिक्षित और सशक्त बनाते हैं।

2. दिव्यांगता सम्बन्धी जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम

सार्वजनिक कार्यकर्ताओं, जैसे सामुदायिक कार्यकर्ताओं, गैर‑सरकारी संगठनों, शिक्षकों, पुलिस कर्मियों, उद्योग और संग्रहालय के कर्मचारियों और आम जनता को दिव्यांगजनों (PWDs) की विशिष्ट आवश्यकताओं से परिचित कराने के लिए आरुषि द्वारा साप्ताहिक अभिविन्यास कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है। इन कार्यशालाओं में, आरुषि में प्रशिक्षित स्वयंसेवक दिव्यांगजनों (PWDs) के साथ अधिक सहजता से और आत्मविश्वास के साथ बातचीत करने के तरीकों पर सरल और व्यावहारिक सुझाव देते हैं।

दिव्यांग पर्यटकों की देखभाल/परवाह करने के विषय में आरुषि का प्रशिक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) में अनिवार्य प्रशिक्षण का हिस्सा है। हर साल, एक सप्ताह के लिए, आरुषि, सांची के स्तूपों के कर्मचारियों और गाइड्स को व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वालों और दृष्टिबाधितों सहित दिव्यांग पर्यटकों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए प्रशिक्षित करती है। आरुषि के स्वयंसेवकों ने मध्य प्रदेश के अन्य ऐतिहासिक स्थलों जैसे भीमबेटका की गुफाओं, भोजपुर, खजुराहो और मांडू में प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए हैं।

स्कूल और कॉलेज के छात्र, विभिन्न संगठनों के कर्मचारी, कलाकार और दुनिया भर की जानी-मानी हस्तियाँ आरुषि का दौरा करती हैं और ब्रेल, सांकेतिक भाषा और दिव्यांगजनों (PWDs) की योग्यताओं/सामर्थ्य और क्षमताओं से परिचित होती हैं।

3. शिक्षक प्रशिक्षण और सहायता

दिव्यांग छात्रों को प्रवेश देने से इन्कार करने के लिए स्कूलों द्वारा बताया जाने वाला मुख्य कारण प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है। इस पर काबू पाने के लिए, आरुषि द्वारा शिक्षकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जो दिव्यांगताओं के बारे में मिथकों और मिथ्या धारणाओं को दूर करने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और दिव्यांग बच्चों द्वारा मुख्यधारा के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण किए जाने के महत्त्व पर ज़ोर देते हैं। दिव्यांग बच्चों के साथ शिक्षकों के अनुभवों पर चर्चा की जाती है; विशेषज्ञ इन बच्चों की विशेष ज़रूरतों से निपटने के बारे में सुझाव साझा करते हैं, और शिक्षकों को अद्यतन शिक्षण पद्धतियों और दिव्यांग छात्रों को पढ़ाने के दौरान ध्यान रखने योग्य बातों से परिचित कराया जाता है। शिक्षक बच्चे की समस्याओं को पहचानने और उनका आंकलन करने के तरीके भी सीखते हैं।

आरुषि द्वारा शिक्षकों को ब्रेल और सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए (राज्य शिक्षा केन्द्र के सहयोग से) फिल्मों का निर्माण किया है। शिक्षकों को देवनागरी और अंग्रेज़ी में वर्णमाला के चार्ट के साथ‑साथ ब्रेल और सांकेतिक भाषा में उनसे सम्बन्धित प्रतीकों के चार्ट उपलब्ध कराए जाते हैं। आरुषि ने विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं के बारे में विवरणिकाएँ (brochures) भी तैयार की हैं जिनका उपयोग स्कूल के शिक्षकों द्वारा किया जाता है। सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के लिए आरुषि द्वारा समावेशन पर निर्मित वृत्तचित्र फिल्मों का उपयोग स्कूली शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए भी किया जा रहा है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में 300,000 से अधिक सरकारी स्कूल शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

4. वार्षिक कार रैली

नेत्रहीन मार्गनिर्देशकों (navigators) के साथ एक कार रैली प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। यह अनूठी कार रैली नेत्रहीन या दृष्टिबाधित व्यक्तियों की क्षमता पर प्रकाश डालती है और दर्शाती है कि समाज उनके समावेशन से कैसे लाभ उठा सकता है।

इस रैली में भाग लेने वाले प्रत्येक प्रतिभागी के साथ एक मार्गनिर्देशक (navigator) होता है जो नेत्रहीन या दृष्टिबाधित होता है और जो ब्रेल में मार्ग मानचित्र (route map) से रास्ता पढ़कर सुनाता है। रैली लोगों को समावेशी वातावरण विकसित करने की आवश्यकता के प्रति संवेदनशील बनाती है। यह नियोक्ताओं और सुविधा प्रदाताओं का ध्यान उन लोगों की क्षमताओं की ओर आकर्षित करती है जो नेत्रहीन या दृष्टिबाधित हैं और इस ओर भी उनका ध्यान आकर्षित करती है कि ब्रेल लिपि उन्हें कैसे समर्थ बनाती है। इस आयोजन के दौरान दृष्टिबाधिता, उसकी रोकथाम और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी पर प्रकाश भी डाला जाता है।

5. अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह
आरुषि द्वारा प्रतिवर्ष दिव्यांगजनों (PWDs) को समर्पित एक वार्षिक अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित किया जाता है। राज्य भर में सिनेमाघरों, स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक केन्द्रों में दिव्यांगता सम्बन्धी मुद्दों पर लगभग सौ भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय फिल्में प्रदर्शित की जाती हैं। इसके बाद दर्शकों के साथ चर्चा की जाती है। इस वार्षिक आयोजन के पीछे उद्देश्य यह है कि दिव्यांगताओं के बारे में लोगों में जागरूकता और संवेदनशीलता निर्मित की जाए और दिव्यांगजनों (PWDs) के प्रति रवैए में बदलाव लाया जाए। फिल्म प्रदर्शन दिव्यांगजनों (PWDs) की सकारात्मक छवियों को भी बढ़ावा देते हैं।

कुछ पहलों पर चिन्तन

हमने जो कुछ देखा और अनुभव किया उस पर कुछ चिन्तन निम्नानुसार है। आरुषि द्वारा की गई कुछ ऐतिहासिक पहलें इस प्रकार हैं।

1. जेल में रिकॉर्डिंग

भोपाल की सेण्ट्रल जेल में कैदियों के साथ एक मुलाकात, जिसमें जघन्य अपराधों के लिए उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी शामिल थे, अद्भुत साबित हुई।

वर्ष 1999 में, एक अनोखे प्रयोग में, आरुषि ने भोपाल सेण्ट्रल जेल के कैदियों से नेत्रहीन या दृष्टिबाधित छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री रिकॉर्ड करने के लिए सम्पर्क किया। जेल के कैदी सहायता प्रदान करने के लिए सहर्ष तैयार थे और तब से, आरुषि की बोलने वाली पुस्तकों (talking books) की लाइब्रेरी में उनका बड़े पैमाने पर योगदान रहा है। पारस्परिक रूप से मूल्यवान साझेदारी में, आरुषि को समर्पित स्वयंसेवक मिल गए और दोषियों को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।

हमने जेल परिसर के अन्दर स्थापित परिष्कृत, ध्वनि-रोधी (sound-proof) रिकॉर्डिंग स्टूडियो देखा, जहाँ से कैदियों द्वारा बोलने वाली पुस्तकों (talking books) की लाइब्रेरी में महत्त्वपूर्ण योगदान देना जारी है, जो दृष्टिबाधित छात्रों के लिए श्रव्य पुस्तकों (audiobooks) की आपूर्ति करती है। इसमें शामिल कुछ कैदियों के साथ एक संक्षिप्त बातचीत एक ज़बरदस्त अनुभव साबित हुई। कैदियों ने इस अवसर के लिए बहुत आभार व्यक्त किया और महसूस किया कि वे जेल में जो वक्त बिता रहे हैं, वह इस पहल में उनकी भागीदारी के माध्यम से न केवल सार्थक बना है, बल्कि इससे उन्हें संतृप्ति प्राप्त हुई है, और उनमें सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना और दिव्यांगजनों (PWDs) के प्रति संवेदनशीलता भी विकसित हुई है। स्पष्ट रूप से, लीक से परे हटकर की गई यह पहल समावेशन का एक अनूठा रूप है जो समाज के दो अलग-अलग लेकिन बहिष्कृत सदस्यों को एक साथ लाती है और उनमें एक सहजीवी सम्बन्ध निर्मित करती है, इस प्रक्रिया में प्रत्येक पक्ष समृद्ध और चिन्ताशील बनकर उभरा है।

2. बाधामुक्त सरकारी विद्यालय

भोपाल‑सीहोर हाईवे पर एक घण्टा गाड़ी चलाने के बाद एक पब्लिक स्कूल की साधारण इमारत नज़र आती है। जैसे ही कोई इस ढाँचे पर ध्यान देने के लिए ठहरता है, पहली बार में उसे कुछ भी उल्लेखनीय प्रतीत नहीं होता है। आश्चर्य की बात है कि हम यह खाली ढाँचा देखने के लिए ग्रीष्मकाल का ताप झेलते हुए इतनी दूर क्यों गए हैं और राज्य के हज़ारों स्कूलों में से इस एक को प्रमुख टेलीविज़न कार्यक्रमों में क्यों दिखाया गया है और इसके बारे में इतना कुछ क्यों लिखा गया है! बारीकी से देखने पर पता चलता है कि ढाँचा वास्तव में अद्वितीय है।

एक मंजिला ढाँचे तक पहुँच सम्भव बनाने के लिए रैंप और रेलिंग का निर्माण किया गया है। इमारत में बाधामुक्त शौचालय और सुलभ पेयजल सुविधाएँ भी मौजूद हैं। मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले के गुड़बेला सरकारी स्कूल को 2000 की शुरुआत में आरुषि द्वारा बाधामुक्त’ बनाया गया। शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए बाधामुक्त पहुँच उपलब्ध कराने वाले भौतिक ढाँचे के अलावा, स्कूल में लिखे हुए को वाणी में बदलने वाले (text-to-speech) स्क्रीन रीडिंग सॉफ्टवेयर के साथ‑साथ श्रव्य अध्ययन सामग्री भी है, जो क्रमशः दृष्टि और श्रवण बाधित बच्चों को उनके गैर‑दिव्यांग साथियों के साथ अध्ययन करने में सक्षम बनाती है।

प्रधानाध्यापक और स्कूल के कुछ पुराने शिक्षकों ने उन शुरुआती दिनों को याद किया जब हर साल, नामांकित 350 से अधिक छात्रों में से कम से कम कुछ बच्चे ऐसे होते थे, जिन्हें मन्द या मध्यम स्तर की दिव्यांगता होती थी। कुछ बच्चों ने माध्यमिक और उच्च विद्यालयों में अपनी पढ़ाई जारी रखी, जबकि कुछ को गरीबी से जुड़ी कठिनाइयों और प्राथमिक वर्षों के बाद सहायता की उपलब्धता के निम्न स्तर के कारण विद्यालय छोड़ना पड़ा।

हालाँकि अब स्थितियाँ अलग हैं। एक कामकाजी दिन, सुबह 11:30 बजे, बिना बच्चों के और केवल कुछ शिक्षकों के साथ स्कूल आमतौर पर सुनसान दिखाई पड़ता है। शिक्षक हमें बताते हैं कि लगभग 30 बच्चे जो नियमित रूप से स्कूल जाते हैं, अब उन्हें अत्यधिक गर्मी की स्थिति और स्कूल में उचित पेयजल सुविधा की उपलब्धता के अभाव के कारण जल्दी घर जाने की अनुमति है। हमारे सरकारी स्कूलों की खराब ढाँचागत सुविधाओं, अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा के लालच और आस‑पास के गाँवों तक असुरक्षित पहुँच ने अधिकांश अभिभावकों को अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लेने के लिए मजबूर कर दिया है ताकि वे उन्हें चारों ओर पनप रहे कम शुल्क लेने वाले ऐसे निजी स्कूलों में भर्ती कर सकें जो उनके बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य का वादा करते हैं। यह वास्तव में एक दुखद स्थिति है कि एक आदर्श विद्यालय जिसने कई लोगों को स्कूलों को समावेशी और सुगम्य बनाने की अपनी पहल का अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया है, वह देश भर के सैकड़ों अन्य पब्लिक स्कूलों की तरह बच्चों को रोके रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। यह शायद इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे प्रणालीगत विफलता और सहायता और अच्छी प्रथाओं’ की निरन्तरता की कमी सर्वोत्तम इरादों को विफल कर सकती है।

3. स्कूल के लिए तैयारी कार्यक्रम

पूर्वस्कूली कक्षा में दो विशेष शिक्षक प्रत्येक बच्चे के साथ व्यक्तिगत रूप से काम कर रहे थे, एक ही समय में बच्चों की व्यवहारिक और भावनात्मक माँगों का जवाब देते हुए, उनकी सीखने की अनूठी ज़रूरतों के अनुरूप उन्हें गतिविधियाँ और कार्य प्रदान कर रहे थे। जैसे कि प्रत्येक बच्चा इस बात के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा था कि शिक्षक उसकी ओर ध्यान दे, कोई आश्चर्य में पड़ सकता है कि यह बच्चे नियमित स्कूल की कक्षाओं का किस प्रकार सामना करेंगे, जिसमें न केवल उप-इष्टतम छात्र‑शिक्षक अनुपात होते हैं, बल्कि अधिकांश शिक्षक भी प्रत्येक बच्चे की अनूठी अधिगम ज़रूरतों को समझने और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं। हालाँकि आरुषि पहले ही कई बच्चों का मुख्यधारा के स्कूलों में प्रवेश करा चुकी है। यह बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं और अपनी चिकित्साओं (therapies) के लिए केन्द्र पर आते हैं और दोपहर में स्कूल के काम में मदद करते हैं।

आरुषि में स्कूल के लिए तैयारी कार्यक्रम में प्रारम्भिक तकनीकों जैसे अवधारणात्मक प्रशिक्षण, दृष्टि-शब्द और सांकेतिक भाषा सीखना शामिल है। दृष्टिबाधित बच्चों को ब्रेल, कंप्यूटर, गणित, अभिविन्यास और गामकता सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाता है; विकासात्मक विलंब और दिव्यांगताओं वाले बच्चों को वाक् चिकित्सा और प्रारम्भिक भाषा प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है; चलन बाधित बच्चों को चिकित्सीय हस्तक्षेप द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, और; अधिगम दिव्यांगताओं वाले बच्चों को व्यक्तिगत शैक्षिक सहायता दी जाती है।

अनुकूलित उपकरण, वैकल्पिक प्रारूपों में शिक्षण सामग्री, परिवहन सुविधाएँ, अतिरिक्त शैक्षिक आदान (inputs) और दैनिक जीवन के कौशलों सम्बन्धी प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराए जाते हैं। एक बार जब वे यह कौशल सीख लेते हैं, तो बच्चों को नियमित स्कूलों में भर्ती कराया जाता है और उन्हें पूर्तिकर सहायता (back-up support) प्रदान की जाती है।

4. ग्रीष्मकालीन कार्यक्रम

गर्मियों के दौरान, नियमित स्कूलों में भाग लेने वाले कई बच्चे ग्रीष्मकालीन कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आरुषि में होते हैं। इसी तरह, कई बच्चे स्कूल के बाद नियमित रूप से अपनी चिकित्सा और हस्तक्षेप सहयोग जारी रखने के लिए विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हैं। गर्मियों के दौरान, आरुषि परिसर गतिविधि और उत्साह से गूंज रहा था – एक क्षेत्र में रंगमंच कार्यशाला, दूसरे में कंप्यूटर कक्षाएँ, भवन के एक और कोने में गायन और नृत्य के साथ‑साथ भौतिक, जल और वाक् चिकित्सा – उपलब्ध स्थान के एक-एक इंच और प्रत्येक कोने का गतिविधियों के लिए सदुपयोग किया जा रहा था।

इमारत की रूपरेखा खूबसूरती से तैयार की गई है, जो पूरी तरह सुगम्य होने के साथ रंग और सौन्दर्यबोध से भरपूर है। बहु/विभिन्न दिव्यांगताओं से प्रभावित बच्चे और साथ ही वयस्क, यथोचित स्थानों पर उपलब्ध कराए गए रेलिंग, रैंप, ब्रेल संकेत और स्पर्श टाइल्स (tactile tiles) का उपयोग करते हुए स्वतंत्र रूप से पूरे परिसर में घूमते हैं।

आरुषि के सभी सदस्यों – शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों के बीच दिखाई देने वाली त्याग और खुशी की भावना न केवल एक सुखद दृश्य है, बल्कि सदस्यों के बीच व्याप्त गर्मजोशी और व्यक्तिगत लगाव दर्शाती है। केन्द्र का वातावरण अपार हर्ष और आशावाद से भरपूर है। कोई भी बच्चा रोता हुआ या खोया हुआ या दुखी दिखाई नहीं देता है। हर कोई प्रसन्न रहता है और अपने काम – पाठ, भौतिक चिकित्सा, वाक् चिकित्सा या व्यावसायिक चिकित्सा – में तल्लीन रहता है। बड़े बच्चे काम करते हुए या छोटे बच्चों की मदद करने के लिए इधर-उधर दौड़ते रहते हैं।

कभी-कभी, किसी को यह महसूस होता है कि सामान्यीकरण’ का कुछ प्रयास किया जा रहा है या शिक्षकों और स्टाफ के सदस्यों द्वारा दिव्यांग बच्चों और वयस्कों के साथ जिस तरह मेलजोल किया जाता है उसमें शायद बच्चों की विशेष ज़रूरतों को एक तरह से नाकारा भी जा रहा है। इससे किसी को यह आश्चर्य हो सकता है कि क्या यह तथाकथित सक्षम’ और दिव्यांग लोगों के बीच मौजूद सीमाओं को छिन्न‑भिन्न करने के लिए एक साभिप्राय किन्तु शायद थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर किया जाने वाला प्रयास है?

निःसंदेह आरुषि में कुछ अनोखा है जो इसे दिव्यांगता क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले अन्य संगठनों से अलग बनाता है। संगठन के सभी कार्यों और पहलुओं में तदर्थता की भावना प्रबल प्रतीत होती है। इसका आकस्मिकता के रूप में गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए, लेकिन कोई इस बात पर ध्यान दिए बिना नहीं रह सकता है कि इतने बड़े पैमाने पर और विविध कार्यों के प्रबन्धन के लिए संरचनाओं, पदानुक्रम और औपचारिक तंत्र के लगभग पूर्ण अभाव में आरुषि संचालन करने में कामयाब रही है। अनौपचारिकता की यही भावना स्टाफ के सदस्यों और आरुषि में आने वाले बच्चों और वयस्कों के बीच मेलजोल में भी दिखाई देती है।

लीक से हटकर समाधान ढूँढना और एक निश्चित तदर्थवाद जो उनके संचालन का तरीका प्रतीत होता है, एक गहरे जीवन दर्शन से भी जुड़ा हुआ है कि कभी भी किसी कार्य को बहुत बोझिल न समझा जाए और हर चीज़ को शान्तिपूर्वक किया जाए। यह मानसिकता उन्हें बढ़ते रहने और कभी किसी की मदद से इन्कार नहीं करने में मददगार रहती है। वे अपने काम के आधिकारिक’ पहलुओं, जैसे प्रभाव के प्रमापन, परियोजना की योजनाओं, प्रस्तावों, आय या व्यय के बारे में बहुत परेशान नहीं लगते हैं। वे लोगों की भलाई में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि सहायता और समर्थन के लिए उन्हें हमेशा अच्छे लोग मिलेंगे। लोग आरुषि में आते हैं और उन चीज़ों को देखते हैं जिन पर ध्यान देने की ज़रूरत है या जिन वस्तुओं की उन्हें आवश्यकता है, और वे ज़िम्मेदारी लेते हैं। आरुषि की संस्कृति का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि वह यथाशक्ति अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने की कोशिश कर उनसे जुड़ाव कायम करती है और जो रुचि रखते हैं उन्हें अपने दायरे में शामिल कर लेती है। यही वह विशेषता है जो उन्हें इतने अधिक और इस तरह के विविध कार्य करने में समर्थ बनाती है।

आभारोक्ति : हम इस यात्रा में हमारे साथ आए हमारे सहयोगियों सुब्रत मिश्रा, प्रसाद कुमार और ऋतिका गुप्ता के सहयोग और समर्थन की हम तहेदिल से सराहना करते हैं। प्रसाद कुमार द्वारा प्रदान किए गए मीडिया सम्बन्धी सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं।

लेखक

शेफ़ाली त्रिपाठी मेहता, एडिटर, यूनिवर्सिटी प्रैक्टिस कनेक्ट; एसोसिएट एडिटर, लर्निंग कर्व।
अंकुर मदान, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी

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