“हम भारत के लोग”: हम से ‘हम’ तक
आशुतोष व्यास स्वतंत्रता और बंधुत्व पर विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

बंधुत्व की भावना बुनियादी मूल्य के रूप में हमारे संविधान की शुरुआती घोषणा “हम भारत के लोग” में उकेरी गई है। इस पर आगे विचार से पहले, ‘हम’ पद के दो महत्त्वपूर्ण अर्थों में मौजूद अंतर को स्पष्ट करना ज़रूरी है। इस लेख में ‘हम’ संविधान में उल्लेख किए गए आदर्श को संदर्भित करेंगे और प्रतिदिन प्रयोग किए जाने वाले हम भारत के लोगों के बारे में भी बात करेंगे। ‘हम भारत के लोग’ में ‘हम’ के संबंध में कुछ ज़रूरी सवालों पर विचार किया जाना आवश्यक है। इसमें पहला तो यह कि आख़िर ‘हम’ का मतलब क्या होता है? इसी से जुड़ा दूसरा सवाल है, क्या हम वह ‘हम’ हैं, जो सबके लिए न्याय, समानता, स्वतंत्रता आदि मूल्यों का अंगीकार, “आत्मार्पण” और अधिनियमन कर रहे हैं। अगर हम वह ‘हम’ नहीं है, तो वह ‘हम’ कैसे बना जा सकता है? दिलचस्प बात तो यह है कि “हम वह ‘हम’ कैसे बन सकते हैं” में यह निहित है कि हममें ‘हम’ बनने की संभावना है।
इन सवालों पर विचार करने के लिये और इनके संभावित जवाब खोजने के लिये, हमें इतिहास में गहराई तक जाना होगा। भारत की आज़ादी (स्वतंत्रता) के संघर्ष के इतिहास को देखने का एक आम नज़रिया यह हो सकता है कि सब अपनी आज़ादी के लिये लड़ रहे थे। इस तरह यहाँ यह ज़ाहिर हो सकता है कि सभी के लिए आज़ादी के मायने अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे, कोई साम्राज्यवादी शक्ति से मुक्त होने को आज़ादी मान रहा था, तो और कुछ लोग उनके निवास क्षेत्र, गतिविधि और विकल्प‑चयन में अतिक्रमण करने वाले से विशिष्ट एवं तात्कालिक मुक्ति को आज़ादी मान रहे थे। आज़ादी और आत्मनिर्भरता के अर्थ की समझ में इतने गंभीर विविधता के बावजूद ज़्यादातर उस आज़ादी के उत्सव में शामिल थे, जो अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी थी।
जब कुछ को यह महसूस हुआ कि आज़ादी के मायने हैं कि अपने घर को खोना, तो उन्होंने ठगा-सा महसूस किया होगा। इसे बेगम जान (2017) फिल्म के एक दृश्य में बखूबी उभारा गया है। फिल्म में बेगम जान और उनके साथियों को पता चलता है कि उनका घर छीना जा रहा है, तो कैसे उनके लिये उस आज़ादी के उत्सव के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। इसी तरह, सतीनाथ भादुड़ी के उपन्यास ढोड़ाय चरितमानस (बांग्ला उपन्यास, हिन्दी अनुवाद, 2008) में एक पात्र को पूरा घर गँवाने पर मुआवज़ा उनकी अपेक्षा कम मिलता है, जिन्होंने घर का सिर्फ़ थोड़ा हिस्सा गंवाया। इस नुकसान ने उस चरित्र को आज़ादी के स्वरूप और मूल्य पर सवाल उठाने को मजबूर किया।
इस ‘हम’ की वास्तविकता के लिए संस्कार या आरोपण की नहीं, स्वराज की आवश्यकता है। स्वराज के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने स्व को अन्य के स्व के साथ लगातार परखता रहता है। स्व को लगातार परखना संवाद के कारण संभव होता है, जिसमें अन्य से जुड़ने की इच्छा ही हमारी अधिकारिता है, न कि समस्त पूर्वग्रहों या भेदों से मुक्ति है।
हमारे इतिहास की यह झलक इस ओर इशारा करती है, कि मूल्यों के मायने अलग-अलग हो सकते हैं। हम सभी “आज़ादी” को मूल्यवान मानते हैं, लेकिन इसके मायने व्यक्तियों, समुदायों, संदर्भों इत्यादि में अलग-अलग हो सकते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, यह पूछा जा सकता है कि तब हमारे संविधान में उकेरे गए ‘हम’ का क्या अर्थ बना पाएंगे। क्या ‘हम’ में सँजोए गए मूल्य में कई विविध अर्थ मौजूद हैं? क्या यह ‘हम’ असंभावित संभावना, अव्यावहारिक और अलब्ध्य आदर्श है? या फिर ‘हम’ किसी विशेष व्यक्ति के मूल्यों/मायनों से सभी ‘अन्यों’ को परिचित और संस्कारित करा कर ही प्राप्त किया जा सकता है। यह तब होता है, जब सभी उस विशेष व्यक्ति के जीवन को अभिलाषा-योग्य मानकर, विशेष व्यक्ति को विशिष्ट पदवी प्रदान करते हैं।
अगर ऐसा है, तो संविधान की प्रस्तावना का क्या अर्थ रह जाएगा, जिसके अनुसार संविधान “हम भारत के लोग” ने अपने आत्म/स्व को अर्पित किया है। अर्पित करना श्रद्धा को दिखाता है। यह अर्पण ख़ुद अपने आप के प्रति श्रद्धा है, यह श्रद्धा ‘हम’ होने की है, यह श्रद्धा ‘हम’ हो जाने की है। इसलिए शायद इस ‘हम’ की वास्तविकता के लिए संस्कार या आरोपण की नहीं, स्वराज की आवश्यकता है। स्वराज के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने स्व को अन्य के स्व के साथ लगातार परखता रहता है। स्व को लगातार परखना संवाद के कारण संभव होता है, जिसमें अन्य से जुड़ने की इच्छा ही हमारी अधिकारिता है, न कि समस्त पूर्वग्रहों या भेदों से मुक्ति है।
यह संवाद एक संबंध है। वैयाकरण भर्तृहरि के ग्रंथ वाक्यपदीयम् का अनुसरण करते हुए कहा जाए तो, संबंध ‘संबंधियों’ पर लगभग पूरी तरह निर्भर करता है, इसी तरह संवाद भी निर्भर है, उन पर जो हम हैं, और उस पर जो हम होते जाएंगे। यहाँ यह बताया जा सकता है, कि सत्यनिष्ठा संवाद को सक्रिय करने वाली शर्त हो सकती है, जो इस पर निर्भर है कि दूसरा अपने बारे में मुझसे झूठ नहीं बोलेगा। हालाँकि यह लेख, उस विश्वास को चर्चा के केंद्र में रख रहा है, कि जो मैं अपने बारे में अभिव्यक्त करूंगा, उससे मुझे मूल्यांकित नहीं किया जाएगा और न ही उसका दुरुपयोग होगा। और जब यह विश्वास टूटेगा, तो अपने-आप को प्रकट करने में संकोच आएगा। साथ ही संवाद के लिए अपेक्षित होगा कि दोनों संबंधी उस विश्वास का लगातार सृजन और पालन‑पोषण करें। इस शाश्वत पालन‑पोषण के लिए संबंधी ख़ुद को, संवाद में अपनी सहभागिता को और स्वयं संवाद के प्रस्फुटन को देखें, अन्यथा यह आदत हो जाएगा। आदत में दूसरे का मूल्य ‘उसके जीवित विकसित गतिशील व्यक्तित्व होने’ या ‘कुछ होने’ से नहीं बनता, बल्कि उसके ‘ज्ञात होने (वह जिसे जान लिया गया है)’ या केवल ‘होने’ से बनता है। जैसे ही यह लगता है कि जिसे हम जानते थे और जिसकी हमें आदत थी, वह दूसरा कुछ अलग‑सा हो रहा है या विकसित हो रहा है, तब वह दूसरा हमारे होने और हमारे अहं के लिए एक ख़तरा बन जाता है और ऐसा बन जाता है, जिसके साथ अब उसके साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन नहीं जिया जा सकता।
कहने का मतलब यह है कि “हम भारत के लोग” का ‘हम’ कथित मुख्यधारा का हम नहीं है, जो ‘संस्कारित सहमतियों’ या आदतों का परिणाम है। इसमें भूभाग की आबादी का अच्छा ख़ासा हिस्सा संवाद का संबंधी बने बिना या इस संबंध में विचार किए बिना अपनी गिनती करवाता है। मुख्यधारा अपने आप में अलोकतांत्रिक विचार है। लोकतंत्र किसी भी तरह सहमतियों के जुटान का नहीं, बल्कि संवाद में और संवाद से उत्तरोत्तर विकसित होने वाली सहमतियों का विचार है। इसमें निर्णय लेना असहमतियों को ख़त्म करने का आधार नहीं है। लोकतंत्र में असहमतियाँ न तो केवल दर्ज की जाती हैं न ही ख़त्म की जाती हैं, बल्कि वे असहमतियाँ पथ प्रदर्शक की संभावना के रूप में हमेशा मौजूद रहती हैं।
हालाँकि, जो हम हैं वह अपने दायरों से संस्कारित है, तो भी शिक्षा एक आशा बन सकती है हमारे ‘हम’ होते जाने में।
ऐसा माना जा सकता है कि भारतीय संविधान में ‘हम’ शक्ति के स्रोत का प्रतिनिधि है। लेकिन सवाल यही है कि क्या हम, जो सब मतदाता हैं या नागरिक हैं, वह ‘हम’ बन गये हैं या फिर यह एक छलावा है, जो हम अपने आप से खेल रहे हैं और जो हमसे खेला जा रहा है।
हमारे ‘हम’ नहीं होने के पक्ष में यह कहा जा सकता है कि हम अगर ‘हम’ होते तो हर बात के लिये कानून होना चाहिये, यह बात नहीं उठाते। इस ज़रूरत और मांग को तीसरे पक्ष के होने की मानसिकता कह सकते हैं। गांधी जी शायद कहते कि यह जो तीसरे पक्ष की मानसिकता है, वह यह मानकर चलती है कि व्यक्ति और व्यक्ति के बीच संबंध अपने-आप विकसित या सृजित नहीं हो सकते हैं। अगर तीसरा पक्ष न हो तो व्यक्ति हमेशा तलवार लेकर खड़े रहेंगे, यानि तीसरे पक्ष के कारण हमारा ‘हम’ होना, बंधुत्व होना संभव है। इसी को हम ऐसे भी कह सकते हैं कि ‘शासित’ होने की मानसिकता हमारे अंदर है। लेकिन तीसरे पक्ष पर यह निर्भरता की वजह से इसे ‘आत्मार्पण’ नहीं कहा जा सकता है।
‘हम’ में किसी अन्य को जबरन ‘हम’ बनाने का कर्तव्य निहित नहीं है, बल्कि अपने आप को ‘हम’ बनाना निहित है। यह हम अनेक लोगों का समूह नहीं है और न ही अनेक लोगों की सामूहिक घोषणा कि हम ‘हम’ हैं। बल्कि, उन आदर्शों या मूल्यों की प्राप्ति है, जिसमें अन्य की स्वतंत्रता, अन्य के साथ समानता, और अन्य की गरिमा समाहित है। यह अपने आप में उन मूल्यों की खोज और उनकी अभिव्यक्ति है, जो स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और बंधुत्व की भावना को अन्य के लिये धारण करते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या हम वह ‘हम’ बन पाये, क्या हम वह ‘हम’ बन सकते हैं और अगर हाँ, तो कैसे?
हम भारतीयों के पास न तो कोई जादू की छड़ी थी, जो उन्नीस सौ सैंतालीस में घुमा दी जाती और सभी ‘हम’ बन जाते, और न ही हम समान मूल्यों में जीने वाले लोग थे कि साम्राज्यवादी या औपनिवेशिक मूल्यों के विरोध स्वरूप उपजे अन्य मूल्यों को सभी ख़ुद‑ब-ख़ुद अपना लेते हैं। साथ ही यह भी कि समय कभी भी दो भागों में नहीं बंटता। पुराने-नए कहे जाने वाले मूल्यों के साथ हम आगे बढ़ते हैं। अगर हम वास्तव में ‘हम’ बनना चाहते हैं, तभी हम, ‘हम’ बन सकते हैं।
जैसे कि डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि राष्ट्र बनने के हमारे ‘संकल्प’ के अलावा कोई भी विचार, घटना, स्थिति या वस्तु हमें राष्ट्र नहीं बना सकती है (“एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान”, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्ग्मय (हिन्दी अनुवाद), खंड 15, पृ. 11 – 21)1। हममें उस संकल्प की और ‘हम’ बनने की संभावना है। हालाँकि, जो हम हैं वह अपने दायरों से संस्कारित हैं, तो भी शिक्षा एक आशा बन सकती है हमारे ‘हम’ होते जाने में। दूसरे को या अपने से अलग को महसूस कराने वाली (अन्यथात्व महसूस कराने वाली) शिक्षा; शिक्षा जो यह सराहने में सहायक हो कि चीज़ें अन्यथा हो सकती हैं, घटनाएँ अन्यथा घट सकती हैं, विचार अन्यथा सोचे जा सकते हैं।
लेखक के बारे में
आशुतोष व्यास ने दिल्ली विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया है। वे वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल में अध्यापन कर रहे हैं। भाषा दर्शन, भर्तृहरि के व्याकरण दर्शन, शिक्षा दर्शन, संवाद और स्वराज प्रत्यय, स्वराज और शिक्षा का संबंध आपके रुचि के क्षेत्र हैं।

